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36 Social

कल्पना और यथार्थ

Imagination & Reality

— Roli Shukla
Social Poem 36
कवि यदि चाहे तो रेगिस्तान में भी झरने बहा सकता है शुष्कता में आर्द्रता की कल्पना तक कर लेता है किन्तु सत्य तो वास्तव में सत्य ही होता हैं गाँवों का रमणीय वर्णन, ग्रामवासियों का प्रसन्न जीवन मात्र कविताओं तक सीमित होता है किन्तु यथार्थ तो यथार्थ ही होता है मेरा ध्यान भी एक ऐसे गाँव की ओर जाता हैं वहाँ की मिट्टी में जल पड़ने से सुरभि तो फैलती है किन्तु उसका आनन्द लेने वाले प्रसन्न चेहरे मुझे दिखाई नहीं देते वहाँ वर्षा भी होती है, आकाश में इन्द्रधनुष भी दिखता है किन्तु उससे पहले मेरी दृष्टि उनके माथे पर खिचे आभावों के इन्द्रधनुष पर पड़ती है वहाँ हरे भरे वृक्ष और खेत तो है किन्तु मैंने वहाँ बंजर और शुष्क धरती भी देखी है वो खेत उनके अपने नहीं होते वो पेट भी भरते है, किन्तु वो पेट उनके अपने नहीं होते ग्रामवासिनी घड़ा लेकर जल भरने तो जाती है किन्तु स्वच्छ जल के स्थान पर किटाणु युक्त पानी ही पाती है उसकी पायल बजती तो है किन्तु उसमें से मधुर ध्वनि के स्थान पर थके हुए बोझिल पावों का रुदन सुनाई देता है फिर ऐसी स्थिति में कवि सौन्दर्य की कल्पना कैसे कर पाता है किन्तु एक बात अवश्य है वहाँ निर्धनता में भी स्वाभिमान है और यही हमारे भारत देश की अटूट पहचान है
— Roli Shukla
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