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37 Social

वह होली

That Holi

— Roli Shukla
Social Poem 37
हुई प्रभात गया रंग घोला भर गयी सब पिचकारी किन्तु एक कोने में बैठी थी एक वृद्धा बेचारी आगे पीछे कोई नहीं था वह थी स्वयं अकेली उसका जीवन कुछ ऐसा था जैसे कोई पहेली वातावरण था रंगारंग और रंग था सब दिशा में व्याप्त किन्तु वो वृद्धा अश्रुधारा से कर रही थी करूण विलाप गृह-गावाक्ष से वह सबकी देख रही थी होली अश्रु प्रवाहित हो रहे थे किन्तु वह कुछ न बोली देख के एक बालक को खो गयी अतीत में गा तो सकती थी वो, पर स्वर नहीं थे गीत में स्मृति आ गयी थी उसको अपने प्यार लाल की याद आ गयी थी उसको होली पिछले साल की अस्वस्थ हो गया था वो कई दिन और मास से किये गये कई प्रयास किन्तु सब हुए असफल किंचित मात्र उसकी अवस्था न पायी थी सम्भल कुछ दिन उपरान्त आया होली का त्यौहार चाह कर भी खेलने न जा पाया कुमार अंतिम बार माँ से बोला माँ ला दे गुलाल नेत्र पट बन्द हुए माँ रो के हुयी बेहाल इसलिए वह दुखी अधिक थी काश आज होता वो लाल भर पिचकारी उसको देती और देती रंग गुलाल
— Roli Shukla
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