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38 Social

अस्तित्व

Existence

— Roli Shukla
Social Poem 38
क्या जाना है अस्तित्व कभी उस नेता का जिसने देश सेवा का व्रत लिया था क्या जाना है अस्तित्व कभी उस पुजारी का जिसने सर्वत्र त्याग किया था क्या जाना है अस्तित्व कभी उस पुलिस अधिकारी का जिसने न्याय करने की शपथ ली थी क्या जाना है अस्तित्व उस समाज सेवक का जिसने जन सेवा की कसम ली थी क्या जाना है अस्तित्व उस साधु का जो बाहृय आडम्बर करता है क्या जाना है अस्तित्व उस पूंजीपति का जो मात्र कहने को दरिद्रों का पेट भरता है इन सबका क्या अस्तित्व है यह सभी को ज्ञात है जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते यही तो विकट बात है क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम भ्रष्टाचार को दूर भगाए और भारत को एक पवित्र स्थल बनाए इसके लिए हमें एकता चाहिए जो हमें सबके सहयोग से मिलेगी तभी यहाँ सुदृढ़ व सरल अस्तित्व की ज्योति जलेगी।
— Roli Shukla
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