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श्रद्धांजलि
Tribute
मन करता है कि बचपन की कुछ यादों में हम खो जायें
इतना डूबें उन यादों में कि लौट के वापस न आयें
वो दिन भी कितने अच्छे थे जब हम मनमानी करते थे
दिन भर दौड़ा भागी करते दिन भर शैतानी करते थे
जब टीका लगवाने की बारी, कभी हमारी आती थी
तो सच में प्यार से माँ की तरह वो साथ हमारे जाती थी
सब दर्द कहीं चला जाता, जब हाथ को पकड़ा करते थे
वो मेरी है नहीं मेरी है, हम दोनो झगड़ा करते थे
हम गलत करें कुछ, हमें बचाने वो आगे आ जाती थी
फिर बाद में हमको प्यार से, धीरे से सब कुछ समझाती थी
वो जाये जहाँ, हम पीछे-पीछे उनके जाया करते थे
कभी गरम समोसे, ठन्डी कुल्फी संग में खाया करते थे
हम कपड़े कौन से क्या पहने वो खुद सिलवा के लाती थी
अपने हाथों से फिर हमको, वो प्रेम सहित पहनाती थी
कहीं गिर जायें हम चोट लगे तो साहस हमको देती थी
खुद बन कर वैद्य हमारी वो, सब घाव ठीक कर देती थी
वो इतनी अच्छी मित्र थी सारी बात हृदय की जाने थी
कुछ कहे बिना ही जान ले सब — पड़ी जरूरत नहीं बताने की
बड़े प्रेम स्नेह वात्सल्य सहित उन्होंने कन्यादान किया
तन, मन, धन से पूर्ण समर्पित मेरी माँ को सम्मान दिया
वो माँ तो नहीं पर माँ जैसी वो हमको सचमुच लगती थी
किया जो भी उन्होंने हमारे लिए एक 'माँ' ही कर सकती थी
कुछ ऐसी थी मेरी माँसी
इस तरह याद कर लेते हैं
हम स्नेह सहित भावुकता संग उनको श्रद्धांजलि देते हैं ।
— Roli Shukla
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