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40 Social

पहचान

Identity

— Roli Shukla
Social Poem 40
सब कहते कि वो हिन्दू है वो सिक्ख है वो मुसलमान शिक्षित होने से लाभ है क्या जब इसका उनको नहीं ज्ञान ये जाति पाति के भेदभाव करते मेरे अन्तर में घाव ये रंग जाति का भेद है क्यों अज्ञान का सब पे प्रेत है क्यों सबके मन में कर्कशता है प्रतिदिन कोलाहल मचता है सबका अपना-अपना है स्वार्थ कोई व्यक्ति नहीं है क्षमाप्रार्थ जाति का आवरण सबके मुख पे कोई काम नहीं आता दुख में उसने जब हमको एक बनाया तब भेद-भाव का प्रश्न क्यों आया सर्वरक्त-रंजित कर के दिखाते है सब हस्त-लाघव क्या ये पहचान पर्याप्त नहीं कि हम सब है एक मानव ।।
— Roli Shukla
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