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42 Social

नारी शक्ति

Women's Power

— Roli Shukla
Social Poem 42
कल रात्रि स्वप्न में मैंने एक रूपसि को देखा श्वेत वस्त्रों से सुसज्जित एक सुन्दरी को देखा यही नहीं नाना अलंकारों से अलंकृत थी वो लगता था अनेक मधुर छन्दों में छन्दबद्ध थी वो गीत थी संगीत थी वो और किसी की नहीं वरन कवि की प्रीति थी वो लगता था भावों से भीगी हुयी है विचार बिन्दु टपकते थे जो उसके रूप को और अधिक उज्जवल कर देते थे श्रृंगार रस से परिपूर्ण प्रतिमा थी वो किसी देश का गौरव या गरिमा थी वो कन्ठ उसका अत्यधिक मधुर था नेत्र उसके किसी प्रतिभा के प्रकाश से चमकते थे हस्त उसके कला कौशल के आलोक से दमकते थे अधरों को आनन्द में रूचि थी उसकी चाल लयवद्ध थी वो तुक यति गति को ध्यान में रख के चलती थी लोग उसकी प्रशंसा करते थकते न थे वो उसे हर युग में देखना और सुनना चाहते थे कि वो उसे सदा इसी रूप में देखें सबसे अधिक तो वो कवि को प्यारी थी कवि उसका और वह कवि की सहगामी थी कभी कवि बन जाता उसका और वह बन जाती कवि की अनुगामी थी वह कोई स्वप्न नहीं एक वास्तविकता है वह रूपसि कोई और नहीं स्वयं नारी शक्ति की अभिव्यक्ति है ।
— Roli Shukla
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